अपने हाथों की लकीरों में बसाले मुझको
मैं हूँ तेरा, तू नसीब अपना बनाले मुझको
मैं जो कांटा हूँ तो चल मुझसे बचाकर दामन
मैं हूँ गर फूल तो जूडे में सजाले मुझको
मैं खुले दर के किसी घर का सामान हूँ प्यारा
तू दबे पाँव कभी आके चुराले मुझको
तर्क-ए-उल्फत की कसम भी कोई होती है कसम
तू कभी याद तो कर भूलने वाले मुझको
मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के माने
ये तेरी सादा दिली मार न डाले मुझको
कल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ
जितना जी चाहे तेरा आज सताले मुझको
मैं खुद को बाँट न डालूँ कहीं दामन दामन
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको
- क़तील शफाई
Thursday, January 17, 2008
कभी हम मिले भी तो क्या मिले
कभी हम मिले भी तो क्या मिले, वही दूरियां वही फासले
न कभी हमारे कदम बढे, न कभी तुम्हारी झिझक गयी
तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी कामयाब न हो सकीं
तेरी याद शाख-ए-गुलाब है, जो हवा चली तो लचक गयी
- डॉ बशीर बदर
न कभी हमारे कदम बढे, न कभी तुम्हारी झिझक गयी
तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी कामयाब न हो सकीं
तेरी याद शाख-ए-गुलाब है, जो हवा चली तो लचक गयी
- डॉ बशीर बदर
ज़िक्र-ए-शब-ए-फिराक
ज़िक्र-ए-शब-ए-फिराक से वह्सत उसे भी थी
मेरी तरह किसी से मोहब्बत उसे भी थी
मुझको भी शौक था नए चेहरों की दीद का
रास्ता बदल के चलने की आदत उसे भी थी
उस रात देर तक वो रहा महव-ए-गुफ्तगू
मसरूफ मैं भी कम था फरागत उसे भी थी
सुनता था वो भी सबसे पुरानी कहानियाँ
ताज़ा रफाकतों की ज़रूरत उसे भी थी
मुझसे बिछड़ के शहर में घुल्मिल गया वो शख्स
हालाकिं शहर भर से रकाबत उसे भी थी
वो मुझसे बढ़ के ज़ब्त का आदि था जी गया
वर्ना हर एक सांस क़यामत उसे भी थी
- मोहसिन नकवी
मेरी तरह किसी से मोहब्बत उसे भी थी
मुझको भी शौक था नए चेहरों की दीद का
रास्ता बदल के चलने की आदत उसे भी थी
उस रात देर तक वो रहा महव-ए-गुफ्तगू
मसरूफ मैं भी कम था फरागत उसे भी थी
सुनता था वो भी सबसे पुरानी कहानियाँ
ताज़ा रफाकतों की ज़रूरत उसे भी थी
मुझसे बिछड़ के शहर में घुल्मिल गया वो शख्स
हालाकिं शहर भर से रकाबत उसे भी थी
वो मुझसे बढ़ के ज़ब्त का आदि था जी गया
वर्ना हर एक सांस क़यामत उसे भी थी
- मोहसिन नकवी
मुस्कुरती हुई धनक है वही
मुस्कुराती हुई धनक है वही,
उस बदन में चमक दमक है वही
फूल कुम्हला गए उजालों के
सांवली शाम में नमक है वही
अब भी चेहरा चराग लगता है
भूल गया है मगर चमक है वही
कोई सिलसिला ज़रूर टूटा है
गुनगुनाती हुई खनक है वही
प्यार किसका मिल था मिटटी में
इस चमेली तले महक है वही
- डॉ बशीर बदर
उस बदन में चमक दमक है वही
फूल कुम्हला गए उजालों के
सांवली शाम में नमक है वही
अब भी चेहरा चराग लगता है
भूल गया है मगर चमक है वही
कोई सिलसिला ज़रूर टूटा है
गुनगुनाती हुई खनक है वही
प्यार किसका मिल था मिटटी में
इस चमेली तले महक है वही
- डॉ बशीर बदर
ग़ालिब छूटी शराब
गालिब छूटी शराब, पर अब भी कभी कभी,
पीता हूँ रोज़-ए-अब्र-ओ-शब-ए-माहताब में।
- मिर्ज़ा ग़ालिब
पीता हूँ रोज़-ए-अब्र-ओ-शब-ए-माहताब में।
- मिर्ज़ा ग़ालिब
Friday, November 23, 2007
आंखों का रंग
आंखों का रंग बात का लहजा बदल गया
वो शख्स एक शाम में कितना बदल गया
कुछ दिन तो मेरा अक्स रहा आइना नक्स
फिर यूं हुआ के खुद मेरा चेहरा बदल गया
जब अपने अपने हाल पे हम तुम न रह सके
तो क्या हुआ जो हमसे जमाना बदल गया
क़दमों तले जो रेत बिछी थी वो चल पड़ी
उसने छुड़ाया हाथ तो सेहरा बदल गया
कोई भी चीज अपनी जगह पर नहीं रही
जाते ही एक शख्स के क्या क्या बदल गया
इक सर्खोसी की मौज ने कैसे किया कमाल
वो भी नियाज़ सारा का सारा बदल गया
उठ कर चला गया कोई वक्फे के दरम्यान
पर्दा उठा तो सारा तमाशा बदल गया
हैरत से सारे लफ्ज़ उसे देखते रहे
बातों में अपनी बात को कैसे बदल गया
शायद वफ़ा के खेल से उकता गया था वो
मंजिल के पास आके जो रस्ता बदल गया
कायम किसी हाल पे दुनिया नहीं रही
ताबीर खो गयी कभी सपना बदल गया
मंज़र का रंग असल में साया था रंग का
जिस ने उसे जिधर से भी देखा बदल गया
अन्दर के मौसमों की खबर उसको हो गयी
उस नौबहार नाज़ का चेहरा बदल गया
आंखों में जितने अस्क थे जुगनू से बन गए
वो मुस्कुराया और मेरी दुनिया बदल गया
अपनी गली में अपना ही घर ढूँढते हैं लोग
हंज़ला ये कौन शहर का नक्सा बदल गया
वो शख्स एक शाम में कितना बदल गया
कुछ दिन तो मेरा अक्स रहा आइना नक्स
फिर यूं हुआ के खुद मेरा चेहरा बदल गया
जब अपने अपने हाल पे हम तुम न रह सके
तो क्या हुआ जो हमसे जमाना बदल गया
क़दमों तले जो रेत बिछी थी वो चल पड़ी
उसने छुड़ाया हाथ तो सेहरा बदल गया
कोई भी चीज अपनी जगह पर नहीं रही
जाते ही एक शख्स के क्या क्या बदल गया
इक सर्खोसी की मौज ने कैसे किया कमाल
वो भी नियाज़ सारा का सारा बदल गया
उठ कर चला गया कोई वक्फे के दरम्यान
पर्दा उठा तो सारा तमाशा बदल गया
हैरत से सारे लफ्ज़ उसे देखते रहे
बातों में अपनी बात को कैसे बदल गया
शायद वफ़ा के खेल से उकता गया था वो
मंजिल के पास आके जो रस्ता बदल गया
कायम किसी हाल पे दुनिया नहीं रही
ताबीर खो गयी कभी सपना बदल गया
मंज़र का रंग असल में साया था रंग का
जिस ने उसे जिधर से भी देखा बदल गया
अन्दर के मौसमों की खबर उसको हो गयी
उस नौबहार नाज़ का चेहरा बदल गया
आंखों में जितने अस्क थे जुगनू से बन गए
वो मुस्कुराया और मेरी दुनिया बदल गया
अपनी गली में अपना ही घर ढूँढते हैं लोग
हंज़ला ये कौन शहर का नक्सा बदल गया
जगमगाते शहर की
जगमगाते शहर की रानाइयों में क्या न था
ढूंढने निकला था जिसको मैं वही चेहरा न था
रेत पे लिख्खे हुए नामों को पढ़कर देख लो
आज तनहा रह गया हूँ कल मगर ऐसा न था
हम वही तुम भी वही मौसम वही मंज़र वही
फासला बढ़ जाएगा इतना कभी सोचा न था
फिक्र के दर पर कोई आहट कोई दस्तक नहीं
वो फ़क़त बीमार जिस का कोई हमसाया न था
छोड़ आया जिन सफीनों को तलातुम के करीब
नाखुदा उनमें तेरा शायद कोई अपना न था
- अमीर कज़ल्बाश
ढूंढने निकला था जिसको मैं वही चेहरा न था
रेत पे लिख्खे हुए नामों को पढ़कर देख लो
आज तनहा रह गया हूँ कल मगर ऐसा न था
हम वही तुम भी वही मौसम वही मंज़र वही
फासला बढ़ जाएगा इतना कभी सोचा न था
फिक्र के दर पर कोई आहट कोई दस्तक नहीं
वो फ़क़त बीमार जिस का कोई हमसाया न था
छोड़ आया जिन सफीनों को तलातुम के करीब
नाखुदा उनमें तेरा शायद कोई अपना न था
- अमीर कज़ल्बाश
Thursday, November 22, 2007
चुपके चुपके
चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है
हमको अब तक आशिकी का वो ज़माना याद है
बाह्जारां इजतिराब-ओ-सद हजारां इश्तियाक
तुझसे वो पहले पहल दिल का लगाना याद है
तुझसे मिलते ही वो बेबाक हो जाना मेरा
और तेरा दांतों में वो उंगली दबाना याद है
खींच लेना वो मेरा परदे का कोना दफ्फतन
और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छुपाना याद है
जानकार सोता तुझे वो कासा-ए-पाबोसी मेरा
और तेरा ठुकरा के सर वो मुस्कुराना याद है
तुझको जब तनहा कभी पाना तो अज राह-ए-लिबाज़
हाल-ए-दिल बातों ही बातों में जताना याद है
जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना न था
सच कहो क्या तुमको भी वो कारखाना याद है
ग़ैर की नज़रों से बचकर सबकी मर्ज़ी के खिलाफ
वी तेरा चोरी छिपे रातों को आना याद है
आ गया गर वस्ल की शब भी कभी ज़िक्र-ए-फिराक
वी तेरा रो रो के मुझको भी रुलाना याद है
दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए
वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है
देखना मुझको जो बर्गास्ता तो सौ सौ नाज़ से
जब मना लेना तो फिर रूठ जान याद है
चोरी चोरी हम से तुम आकर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुजरीं पर अब तक वो ठिकाना याद है
वक़्त-ए-रुखसत अलविदा का लफ्ज़ कहने के लिए
वो तेरे सूखे लबों का थरथराना याद है
बावजूद-ए-इद्दा-ए-इत्ताका हसरत मुझे
आज तक अहद-ए-वफ़ा का ये फसाना याद है
-हसरत मोहनी
हमको अब तक आशिकी का वो ज़माना याद है
बाह्जारां इजतिराब-ओ-सद हजारां इश्तियाक
तुझसे वो पहले पहल दिल का लगाना याद है
तुझसे मिलते ही वो बेबाक हो जाना मेरा
और तेरा दांतों में वो उंगली दबाना याद है
खींच लेना वो मेरा परदे का कोना दफ्फतन
और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छुपाना याद है
जानकार सोता तुझे वो कासा-ए-पाबोसी मेरा
और तेरा ठुकरा के सर वो मुस्कुराना याद है
तुझको जब तनहा कभी पाना तो अज राह-ए-लिबाज़
हाल-ए-दिल बातों ही बातों में जताना याद है
जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना न था
सच कहो क्या तुमको भी वो कारखाना याद है
ग़ैर की नज़रों से बचकर सबकी मर्ज़ी के खिलाफ
वी तेरा चोरी छिपे रातों को आना याद है
आ गया गर वस्ल की शब भी कभी ज़िक्र-ए-फिराक
वी तेरा रो रो के मुझको भी रुलाना याद है
दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए
वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है
देखना मुझको जो बर्गास्ता तो सौ सौ नाज़ से
जब मना लेना तो फिर रूठ जान याद है
चोरी चोरी हम से तुम आकर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुजरीं पर अब तक वो ठिकाना याद है
वक़्त-ए-रुखसत अलविदा का लफ्ज़ कहने के लिए
वो तेरे सूखे लबों का थरथराना याद है
बावजूद-ए-इद्दा-ए-इत्ताका हसरत मुझे
आज तक अहद-ए-वफ़ा का ये फसाना याद है
-हसरत मोहनी
ये कैसी अजब ज़िंदगी है
ये कैसी अजब ज़िंदगी की घडी है
की जब साए की भी रफाकत नहीं है
कोई शख्स उनको नया जो मिल तो
कहा के पुराने की आदत नहीं है
मेरी आँख बोझल न हो गर तो कैसे
कोई बोझ सहने की आदत नहीं है
कोई आके खोले मेरी बंद आंखें
मुझे अब जगने की आदत नहीं है
कोई खल्क की बंदगी जो करे गर
तो ये बंदगी है, इबादत नहीं है
जो मफ्लूम पूछे कोई अब्द का तो
कहें, ये बताने की आदत नहीं है
सफर ये कठिन है बताया था उनको
उन्हें साथ चलने मैं राहत नहीं है
जो हर पल हमें आजमाते रहे हों
उन्हें आजमाने की आदत नहीं है
वफ़ा लफ्ज़ कहते रहे उम्र भर जो
उन्हें ये निभाने की आदत नहीं है
जो तुम खेलते हो तो खेलो दिलों से
हमें दिल लगाने की आदत नहीं है
जो कहते थे तुमको है सपनों मैं देखा
वो कहते हैं ख़्वाबों की आदत नहीं है
किसी की हंसी याद आती है वर्ना
हमें मुस्कुराने की आदत नहीं है
जो देखी वो आंखें, कदम उनके बोझल
कहें हमको मंजिल की आदत नहीं है
रहे दस्त के उम्र भर जो मुसाफिर
कदम दो कदम की भी आदत नहीं है
नया शहर हर दिन, नया दर हर एक शब
डगर पूछने की भी हाज़त नहीं है
हमें घर मिला भी तो उस वक़्त साजिद
के जब घर को जाने की आदत नहीं है
की जब साए की भी रफाकत नहीं है
कोई शख्स उनको नया जो मिल तो
कहा के पुराने की आदत नहीं है
मेरी आँख बोझल न हो गर तो कैसे
कोई बोझ सहने की आदत नहीं है
कोई आके खोले मेरी बंद आंखें
मुझे अब जगने की आदत नहीं है
कोई खल्क की बंदगी जो करे गर
तो ये बंदगी है, इबादत नहीं है
जो मफ्लूम पूछे कोई अब्द का तो
कहें, ये बताने की आदत नहीं है
सफर ये कठिन है बताया था उनको
उन्हें साथ चलने मैं राहत नहीं है
जो हर पल हमें आजमाते रहे हों
उन्हें आजमाने की आदत नहीं है
वफ़ा लफ्ज़ कहते रहे उम्र भर जो
उन्हें ये निभाने की आदत नहीं है
जो तुम खेलते हो तो खेलो दिलों से
हमें दिल लगाने की आदत नहीं है
जो कहते थे तुमको है सपनों मैं देखा
वो कहते हैं ख़्वाबों की आदत नहीं है
किसी की हंसी याद आती है वर्ना
हमें मुस्कुराने की आदत नहीं है
जो देखी वो आंखें, कदम उनके बोझल
कहें हमको मंजिल की आदत नहीं है
रहे दस्त के उम्र भर जो मुसाफिर
कदम दो कदम की भी आदत नहीं है
नया शहर हर दिन, नया दर हर एक शब
डगर पूछने की भी हाज़त नहीं है
हमें घर मिला भी तो उस वक़्त साजिद
के जब घर को जाने की आदत नहीं है
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